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पूर्ण बनना

दाजी
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पूर्ण बनना

प्रिय मित्रों,


योग का उद्देश्य एकीकरण है जिसकी शुरुआत शरीर, मन और आत्मा के एकीकरण से होती है। इसलिए मैं एक प्रमुख प्रबंधन विशेषज्ञ डॉ. इचक अडीज़ेस द्वारा ईजाद किए गए एकीकरण गुणक (quotient) पर विचार कर रहा हूँ कि यह इंसानों के रूप में हम पर कैसे लागू होता है। उनका गुणक इस प्रकार दिखता है –

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एक व्यक्ति के रूप में हमारी सफलता हमारे एकीकृत और पूर्ण होने की हमारी क्षमता में दिखती है। यह मन की शांति, प्रसन्नता, संतुलन और संयम, व्यवसायिक उन्नति, सत्यनिष्ठा इत्यादि जैसी चीज़ों के रूप में प्रकट होती है। आंतरिक विघटन हमें पीछे धकेलता है और यह आंतरिक अशांति, आत्म-संदेह, अविश्वास और विनाशकारी प्रवृत्तियों के रूप में परिलक्षित होता है।

नियमानुसार, ऊर्जा पहले आंतरिक विघटन (विभाजक) का समाधान करने की ओर निर्देशित होती है और उसके बाद केवल बची हुई ऊर्जा ही बाह्य एकीकरण (अंश-गणक) के लिए प्रवाहित होती है। उदाहरण के लिए, जब हम बीमार होते हैं या भावनात्मक रूप से अशांत होते हैं तब हमारे पास नई खोज और रचनात्मकता के लिए बहुत कम ऊर्जा बचती है। जब हम आंतरिक विघटन को कम कर लेते हैं तब एकीकरण और सफलता के लिए ऊर्जा उपलब्ध हो जाती है। सामान्यतया गुणक का मान जितना अधिक होगा, हमारे खुश और स्वस्थ रहने की संभावना उतनी ही अधिक होगी जबकि इसका मान जितना कम होगा आंतरिक विघटन उतना ही अधिक होगा और अशांति भी उतनी अधिक होगी।

चरित्र, व्यवहार और प्रवृत्तियाँ

व्यवहार के दृष्टिकोण से हम इसे किस प्रकार बेहतर ढंग से समझ सकते हैं? अष्टांग योग के पहले दो अंग यम और नियम हैं। यम का अर्थ है अवांछित चारित्रिक लक्षणों और प्रवृत्तियों को दूर करना जबकि नियम का अर्थ है उच्च चारित्रिक गुणों और प्रवृत्तियों को विकसित करना।

पाँच यम इस प्रकार हैं –

अहिंसा - हिंसा, उग्र प्रवृत्तियों और ज़ोर-ज़बरदस्ती का निवारण ताकि प्रेम बना रहे

सत्य - विकृति को दूर करना ताकि सत्य और प्रमाणिकता बनी रहे

अस्तेय - चोरी करने की आदत का निवारण ताकि देने का स्वभाव बना रहे

ब्रह्मचर्य - संवेदी असंतुलन व उसकी अधिकता को हटाना ताकि संयम बना रहे

अपरिग्रह - स्वामित्व की भावना का निवारण ताकि उदारता बनी रहे।

इन यमों को विकसित करके, हम आंतरिक विघटन और इसे बनाए रखने में ऊर्जा के व्यय को कम कर पाते हैं। वास्तव में इन यमों को अपनाने से स्वाभाविक रूप से विभाजक शून्य की ओर होने लगेगा जिसका अर्थ है कि केवल इस एक अंग के माध्यम से पूर्ण बनने की हमारी क्षमता असीमित हो जाती है। हालाँकि यह एक अद्भुत उपलब्धि है किंतु फिर भी यही सब कुछ नहीं है।

हम पाँच नियमों को अपनाकर, अपने अंश-गणक (numerator) पर भी काम कर सकते हैं –

शौच - शरीर और मन की पवित्रता का विकास

संतोष - संतुष्टि और आंतरिक प्रसन्नता का विकास

तपस - आत्म-अनुशासन के माध्यम से उज्जवल सादगी का विकास

स्वाध्याय - आत्म-जागरूकता का विकास और स्वाध्याय द्वारा निरंतर सुधार

ईश्वर प्रणिधान - ईश्वर के प्रति समर्पण भावना का विकास

इन यमों और नियमों का अभ्यास दरअसल केवल दूसरों के साथ हमारे रोज़मर्रा के संबंधों में ही किया जा सकता है। ये उन सन्यासियों के लिए नहीं हैं जो समाज और सांसारिक जीवन का त्याग कर देते हैं।

इस संदर्भ में जब हम अडीज़ेस गुणक को देखते हैं तब हम अंश-गणक में नियम और विभाजक में यम को प्रतिस्थापित कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, अधिकतम एकीकरण के लिए विभाजक को कम करने और अंश-गणक को बढ़ाने के लिए, हम कह सकते हैं –

सफलता= ƒ { शौच + संतोष + तपस + स्वाध्याय + ईश्वर प्रणिधान
                       अहिंसा + सत्य + अस्तेय + ब्रह्मचर्य + अपरिग्रह

 

यम और नियम को कैसे विकसित करें?

और अब इसका चुनौती देने वाला हिस्सा आता है। इन यमों और नियमों को कैसे विकसित करें?आइए, हम पहले यम यानी अहिंसा को लेते हैं। क्या हर परिस्थिति से हिंसा को दूर करना आसान है? इसका अर्थ मात्र हत्या करना नहीं है बल्कि इसका अर्थ किसी अन्य व्यक्ति से चिढ़ना, लोगों को झिड़कना या किसी न किसी तरह - निष्क्रिय रूप से या आक्रामक रूप से - किसी व्यक्ति को अनदेखा करना है जब या तो आप उसे पसंद नहीं करते अथवा वह आपसे असहमत होता है। जैसे-जैसे हम अपने व्यवहार पर काम करने लगते हैं, हम हिंसा के सूक्ष्म रूपों में कुशल होने लगते हैं और यह सोचने लगते हैं कि हमने इस पर काबू पा लिया है जबकि वास्तव में हम और अधिक प्रबल विरोधी बन जाते हैं।

दूसरा यम है सत्य। यह बड़ा ही पेचीदा है क्योंकि जितने लोग हैं उतने ही संसार हैं - हम सभी की सत्य को लेकर अपनी-अपनी समझ और जागरूकता है। वास्तव में हम आध्यात्मिक यात्रा के दौरान तब तक परम सत्य की स्थिति तक नहीं पहुँच पाते जब तक हम बहुत आगे नहीं बढ़ जाते हैं और सभी प्रकार के प्रभाव या आवरण दृष्टि से दूर नहीं हो जाते। यह यम पूरी तरह से आध्यात्मिक अभ्यास और उसके परिणामस्वरूप होने वाली जागरूकता के विस्तार पर निर्भर है।

तीसरा यम है चोरी न करना। हममें से अधिकांश लोग कहेंगे, “मैं चोरी नहीं करता,” लेकिन जब हम चिंतन करते हैं तब हमें पता चलता है कि यह हमारे जीवन के अनेक पहलुओं को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, हमारा वर्तमान पर्यावरणीय संकट, जलवायु परिवर्तन और प्रजातियों का बड़े पैमाने पर विलुप्त होना, यह सब बिना किसी रोक-टोक के धरती माता की संपदा की हमारी चोरी का ही परिणाम है।

ओशो हमें चुनौती देते हुए कहते हैं कि हममें से अधिकांश लोग अधिकतर समय चोरी करते हैं। भले यह पैसे, ज़मीन या संपत्ति की चोरी न हो, लेकिन हम दूसरे लोगों के विचारों और शब्दों की चोरी करते हैं। उनका कहना है कि हमारा ज़्यादातर ज्ञान और हमारे विचार चुराए हुए होते हैं।

हार्टफुलनेस के प्रथम मार्गदर्शक लालाजी कहते हैं, “अपने अधिकार से अधिक लेना भी चोरी है। अगर हम कोई ऐसी चीज़ जमा करते हैं जो वर्तमान में उपयोगी नहीं है लेकिन हम उसे भविष्य के लिए रखते हैं तो यह भी चोरी है क्योंकि वह किसी और के लिए उपयोगी और आवश्यक हो सकती है जबकि वह हमारे लिए बेकार है। भविष्य के लिए वर्तमान में आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी चोरी है।”

और स्वामी विवेकानंद लिखते हैं, “प्राप्त करना चोरी करने जितना ही बुरा है क्योंकि उपहार प्राप्त करने वाले के मन पर देने वाले का मन असर करता है जिससे प्राप्तकर्ता के मन की स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है।”

प्रमुख उद्योग चोरी की इस मानसिकता पर ही निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, फ़ैशन की दुनिया इस बात पर निर्भर करती है कि हम एक व्यक्ति विशेष की तरह कपड़े पहनकर या उसके जैसी केश सज्जा करके उसकी तरह दिखना चाहते हैं।

लेकिन चोरी न करना केवल शुरुआत है। हम इस सिद्धांत के अगले स्तर यानी उदारता और देने वाले स्वभाव की ओर भी बढ़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब हम समानुभूतिपूर्ण, करुणामय और प्रेमपूर्ण होते हैं और जब हम प्राप्त करने से अधिक देते हैं तब हम और अधिक मददगार भी होते हैं।

चौथा यम ब्रह्मचर्य यानी इंद्रियों और कामुक प्रवृत्तियों का संयम है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हम अपनी इंद्रियों के माध्यम से ही संसार से जुड़ते हैं, यह हर उस चीज़ में शामिल है जो हम सोचते हैं, महसूस करते हैं और कार्यान्वित करते हैं। ब्रह्मचर्य का तात्पर्य है विचार की शुद्धता और ऊर्जा का अपव्यय न करना। कामुकता केवल सेक्स से ही संबंधित नहीं है। हमारी इंद्रियाँ भोजन, कपड़े, नशीली वस्तुओं, डिजिटल तकनीक या किसी अन्य कार्य से भी उत्तेजित हो सकती हैं जिससे हममें इच्छा-आधारित आसक्ति होने लगती है। इसका संबंध जीवन के सभी क्षेत्रों में संयम लाने से है।

आध्यात्मिक अभ्यास करने से हम एक ऐसी अवस्था तक पहुँच सकते हैं जहाँ इंद्रियों का कोई खिंचाव नहीं रह जाता और इसे ‘उपरति’ के रूप में जाना जाता है। जैसा कि योग में हर चीज़ के साथ होता है इसमें भी चरणबद्ध प्रगति होती है जो संयम और आत्म-अनुशासन से आरंभ होकर उपरति की प्रयासरहित और आनंदमय स्वतंत्रता तक पहुँच जाती है।

संयम का सीधा प्रभाव हमारी प्रसन्नता के स्तर पर पड़ता है क्योंकि प्रसन्नता से लेकर उदासी तक का पूरा विस्तार संवेदी क्षेत्र के अंदर होता है। हमारी इच्छाओं की संख्या और उन इच्छाओं की तीव्रता जितनी कम होती है, प्रसन्नता उतनी ही ज़्यादा होती है। इच्छाओं की उत्पत्ति इंद्रियों के खिंचाव पर और इस बात पर निर्भर करती है कि हम कामुकता को कितना अनियंत्रित रहने देते हैं। फिर भी, ब्रह्मचर्य के माध्यम से इंद्रियाँ बाधा के बजाय सहयोगी बन सकती हैं।

एक व्यक्ति जो संयम के उच्च स्तर पर पहुँच गया है, धरती पर उसका नकारात्मक प्रभाव बहुत कम हो जाता है और वह किसी भी चीज़ या व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं करता है। उसके बोलने के तरीके में संयम होता है तथा उसकी मनःस्थिति, पारस्परिक संबंध, खाने, सोने, चलने, काम करने और खेलने का तरीका भी संयमित हो जाता है। फिर आजीविका और व्यक्तिगत जीवन में संतुलन के बारे में अथवा स्वस्थ भोजन को बढ़ावा देने के लिए मिताहारी बनने के बारे में बात करने की कोई आवश्यकता नहीं रहती और वह किसी नशे या लत का शिकार भी नहीं होता। हरेक चीज़ सही तरीके से होती है।/p>

पाँचवाँ यम अपरिग्रह है - जो आवश्यक है, मात्र वही लेने और उपयोग करने का सिद्धांत। इसमें आत्म-संयम और अतिभोग, लोभ व लालच से बचना शामिल है। दूसरी परिभाषा यह है कि आप जितना प्राप्त करते हैं उससे अधिक देना है। इसका अर्थ अभाव की बजाय प्रचुरता की चेतना में रहना है। इसका मतलब है कि संसार जो कुछ भी हमें प्रदान करता है उसमें ही संतुष्ट रहना है।

इन पाँच यमों का आंतरिक विघटन को दूर करने में बड़ा हाथ है। और इन्हें एकीकरण गुणक के विभाजक को शून्य के निकट लाने के लिए प्रारूप दिया गया है। इसके लिए नियमित आध्यात्मिक अभ्यास महत्वपूर्ण है और विशेष रूप सेसफ़ाई, का अभ्यास जो आंतरिक विघटन करने वाले सभी अवचेतन नियोजनों को मन से साफ़ करता है।

एकीकरण गुणक के अंश-गणक की ओर मुड़ते हुए हम नियम पर आते हैं। सबसे पहला है - स्वच्छता और शुद्धता। शुद्धता आंतरिक रूपांतरण का सार है। आंतरिक शुद्धता से प्रसन्नता, एकाग्रता और इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है।

दूसरा नियम है - संतोष और आंतरिक प्रसन्नता। जो कुछ भी हो रहा है उसकी पूर्ण और स्वाभाविक स्वीकृति ही संतोष है। यह किसी भी स्थिति में एक तटस्थ प्रारंभिक बिंदु बनाने की दिशा में पहला कदम है जहाँ से आगे बढ़ना है, तब भी जब परिवर्तन की आवश्यकता हो।

शेष तीन नियम - आत्म-अनुशासन (तपस), स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण (ईश्वर प्रणिधान) के माध्यम से परिशोधन - क्रिया योग के रूप में जाने जाते हैं। अपने सोचने के तरीके को बदलने की कोशिश करने से उसका परिणाम हमारे कार्यों में दिखाई देने लगता है।

आत्म-अनुशासन, श्रेष्ठतम बनने के लिए स्वयं को निरंतर परिष्कृत करते रहने की प्रक्रिया है। यह एक सहज, सरल और प्रेम से भरपूर जीवन जीने की हमारी यात्रा है जो आत्म-प्रेम से शुरू होकर स्वयं प्रेम बन जाने में परिणित होती है।

स्वाध्याय मनोविज्ञान का आधार है। यह अपने आंतरिक जगत के बारे में जानने की उत्सुकता पर आधारित है। यह ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग भी है जिसका तात्पर्य है कि ईश्वर हमारे भीतर ही है। जब हम अपने अस्तित्व के सभी आयामों के साक्षी बनते हैं तब यम और नियम को अपनाना सहज हो जाता है क्योंकि हम समझ जाते हैं कि क्या दूर करने की ज़रूरत है और क्या विकसित करने की। हमारी आदतें धीरे-धीरे हमारे समक्ष उजागर होने लगती हैं, वे आदतें भी जो अवचेतन में गहराई से नियोजित होती हैं। स्वाध्याय में हम प्रकाश को अपने केंद्र से बाहर की ओर फैलाते हैं और अपने चरित्र के हर पहलू को प्रकाशित करते हैं।

अंतिम नियम ईश्वर प्रणिधान अर्थात ईश्वर के समक्ष समर्पण करके हम ईश्वर के साथ निरंतर जुड़े रहते हैं। चाहे हम जाग रहे हों या सो रहे हों, जागरूक हों या अनजान, सक्रिय हों या निष्क्रिय, हम इसी अवस्था में रहते हैं। योग में समर्पण की अवधारणा बहुत सकारात्मक है - हमें पोषित व संरक्षित किया जाता है तथा हमें सहारा दिया जाता है जैसे माँ की गोद में एक नवजात शिशु हो। यह एक मुक्त व निश्चिंत अवस्था है। जब हम अपने कर्मों का सारा फल ईश्वर को अर्पित कर देते हैं तब हमें शांति मिलती है। हम न तो श्रेय लेते हैं और न ही दोष अपने ऊपर लेते हैं क्योंकि दोनों ही ईश्वर को समर्पित हैं।

जब हम अपना अध्ययन कर लेते हैं, स्वयं को शुद्ध व परिष्कृत कर लेते हैं तब समर्पण बहुत आसान हो जाता है। यह सर्वोच्च गुण है। यह अन्य गुणों की पराकाष्ठा है। पूर्ण समर्पण में ही ज्ञानोदय का मूल आधार है।

इन सभी गुणों का विकास हार्टफुलनेस ध्यान पद्धति के माध्यम से संभव है। आप यह भी कह सकते हैं कि यौगिक प्राणाहुति के होने से यह अपने आप होता है, हालाँकि प्रयास और रुचि की आवश्यकता होती है। मुझे आशा है कि आप इसे स्वयं आज़माएँगे और अनुभव करेंगे कि आपके सामने क्या उजागर होता है। यह व्यक्तिगत और सामुदायिक एकीकरण व विकास का एक अचूक तरीका है जो हमारे जीवन में आनंद और उद्देश्य लाता है।

प्यार और आदर सहित,
दाजी

**Reprinted with permission from www.heartfulnessmagazine.com

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